नवरात्रि में कन्या पूजन — विधि, सामग्री एवं अष्टमी या नवमी
कन्या पूजन नवरात्रि का वह अनुष्ठान है जिसमें छोटी कन्याओं को माँ दुर्गा का जीवंत स्वरूप मानकर पूजा जाता है, प्रायः अष्टमी या नवमी को। नौ कन्याओं — परंपरा अनुसार दो से दस वर्ष की — और भैरव रूप में एक बालक को घर बुलाकर उनके चरण धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है, और हलवा, पूरी एवं चने का भोग दक्षिणा व उपहार सहित दिया जाता है। दिन अपनी पारिवारिक परंपरा अनुसार चुनें, और सटीक तिथि अपने शहर के पंचांग से लें।
कन्या पूजन क्या है?
कन्या पूजन, जिसे कंजक या कुमारी पूजन भी कहते हैं, देवी के सबसे पवित्र स्वरूप का सम्मान है। नवरात्रि में दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है, और अंतिम दिनों में परिवार नौ कन्याओं को उन्हीं नौ रूपों के रूप में पूजता है। यह नौ दिनों की उपासना के लिए माँ का आभार है, और परिवार — विशेषकर बच्चों — को यह सिखाता है कि हर कन्या में देवी का सम्मान करना चाहिए।
अष्टमी या नवमी — कन्या पूजन कब करें?
दोनों ही सही हैं। कई परिवार महा अष्टमी को कन्या पूजन करते हैं, और कई महा नवमी को; अपने परिवार की परंपरा का पालन करें। महत्व तिथि का है, कैलेंडर की तारीख़ का नहीं — कुछ वर्षों में अष्टमी और नवमी एक ही दिन पड़ जाती हैं या आपस में मिल जाती हैं। अपने शहर का पंचांग देखें या गुरुजी से पूछें, और उस दिन की दुर्गा पूजा के बाद प्रातः कन्या पूजन करें।
कन्या पूजन की विधि कैसी होती है?
कन्याओं को एक दिन पहले निमंत्रण दें। उनके आने पर आदर से स्वागत करें, स्वच्छ जल से चरण धोएँ और धीरे से पोंछें। उन्हें स्वच्छ आसन पर बिठाएँ, रोली या कुमकुम का तिलक लगाएँ और कलाई पर कलावा बाँधें। पुष्प अर्पित करें, उनके सामने दीप जलाएँ और हर कन्या में माँ दुर्गा का ध्यान करें। भोग परोसें, और भोजन के बाद दक्षिणा एवं उपहार देकर उनके चरण छूकर आशीर्वाद लें, फिर विदा करें।
कौन-सी सामग्री एवं भोग चाहिए?
पारंपरिक भोग सूजी का हलवा, पूरी और सूखे काले चने हैं, जो ताज़े और बिना प्याज़-लहसुन के बनें। साथ में चरण धोने हेतु स्वच्छ जल व थाली, रोली या कुमकुम, अक्षत, कलावा, पुष्प, दीप, और दक्षिणा के साथ कोई छोटा उपहार — जैसे चुनरी, चूड़ियाँ, पढ़ाई का सामान या फल। सरल और सच्चे मन से करें — खर्च से कहीं अधिक श्रद्धा का महत्व है।
कितनी कन्याएँ, और किस आयु की?
नौ कन्याएँ पारंपरिक संख्या है — दुर्गा के हर रूप के लिए एक — और भैरव या लंगूर रूप में एक बालक। परंपरा अनुसार लगभग दो से दस वर्ष की कन्याओं को बुलाया जाता है, और हर आयु देवी के किसी रूप से जुड़ी मानी जाती है, जैसे दो वर्ष की कन्या कुमारी और नौ वर्ष की दुर्गा। अधिक या कम कन्याएँ बुलाने पर भी पूजा पूर्ण है; भाव देवी के सम्मान का है, सटीक गिनती का नहीं।
नौ कन्याएँ न मिलें तो क्या करें?
जितनी कन्याएँ मिलें, उन्हें उसी आदर से बुलाएँ — सच्चे मन से की गई पूजा में एक या दो कन्याएँ भी पर्याप्त हैं। कुछ परिवार किसी मंदिर या बाल-आश्रम में कन्याओं को भोग एवं उपहार भी देते हैं। यदि आप यात्रा में हैं या विदेश में रहते हैं, तो हरिद्वार में आपके नाम एवं गोत्र के संकल्प से नवरात्रि दुर्गा पूजा या हवन आपकी ओर से कराया जा सकता है।
नवरात्रि पूजा में गुरुजी कैसे सहायता कर सकते हैं?
अपने शहर की सही तिथि, कन्या पूजन की विधि, या आपकी ओर से दुर्गा सप्तशती पाठ अथवा नवरात्रि हवन के लिए गुरुजी को व्हाट्सएप करें। मार्गदर्शन ईमानदार एवं सरल है, और किसी भी पूजा का शुल्क बुकिंग से पहले स्पष्ट बताया जाता है।
इस विषय में आगे
🎉 पर्व, व्रत एवं मुहूर्त
अर्थ, विधि, कथा एवं सही समय
इस विषय के सभी 21 लेखआगे पढ़ें
इस विषय पर गुरुजी से बात करें 🙏
व्हाट्सएप पर बात करें