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दशहरा 2026 — विजयादशमी पूजा विधि, शस्त्र पूजा एवं शमी पूजन

पंडित गिरीश चंद्र परगाँई द्वाराअपडेट 10 अक्टूबर 20268 मिनट

दशहरा 2026, जिसे विजयादशमी भी कहते हैं, मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है — आश्विन शुक्ल दशमी, शारदीय नवरात्रि के ठीक बाद। यह असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है: श्रीराम की रावण पर और माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय। घर पर परिवार अपराजिता पूजन, शमी पूजन एवं शस्त्र पूजा करते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और संध्या को रावण दहन देखते हैं। अपने शहर का सटीक विजय मुहूर्त पंचांग से लें।

दशहरा 2026 कब है, और विजय मुहूर्त क्या होता है?

अधिकांश पंचांगों के अनुसार दशहरा 2026 मंगलवार, 20 अक्टूबर को आश्विन शुक्ल दशमी पर है। विजय मुहूर्त दोपहर का एक छोटा समय होता है — परंपरा अनुसार दिन का ग्यारहवाँ मुहूर्त — जिसे अपराजिता पूजन, शमी पूजन, सीमोल्लंघन और नए कार्य के आरंभ के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सूर्योदय और तिथि का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए घड़ी का समय भी हर जगह अलग होता है।

इसलिए किसी फ़ॉरवर्ड किए गए संदेश या दूसरे शहर का मुहूर्त न उठाएँ। अपने शहर का पंचांग देखें, या यदि उस दिन कोई महत्वपूर्ण कार्य आरंभ करना हो तो अपनी कुंडली के साथ गुरुजी से दिखवा लें। सही समय में शांत मन से की गई पूजा, किसी "परफ़ेक्ट" मिनट पर जल्दबाज़ी में की गई पूजा से कहीं श्रेष्ठ है।

विजयादशमी क्यों मनाई जाती है?

विजयादशमी दो विजयों का पर्व है। रामायण के अनुसार श्रीराम ने देवी की उपासना के बाद इसी दिन रावण का वध किया, और देवी माहात्म्य के अनुसार माँ दुर्गा ने नौ रात्रियों के युद्ध के बाद महिषासुर का संहार किया। इसलिए यह दिन अधर्म पर धर्म की, और अहंकार पर विनम्रता व सत्य की विजय का प्रतीक है। संध्या को रावण का पुतला इसी स्मरण के लिए जलाया जाता है — कि हम अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को भी जलाएँ।

दशहरा नवरात्रि के नौ दिनों का समापन भी है। कई परिवार नवमी पर कन्या पूजन और हवन से नवरात्रि पूर्ण करते हैं, और दशमी पर अपनी पारिवारिक परंपरा अनुसार कलश व जवारों का विसर्जन करते हैं। यह नए आरंभ का, बड़ों के चरण स्पर्श का, और पड़ोसियों व मित्रों के साथ मिठाई बाँटने का दिन है।

दशहरे पर अपराजिता पूजन कैसे करें?

अपराजिता पूजन विजयादशमी की दोपहर, संभव हो तो विजय मुहूर्त में, ईशान कोण की ओर मुख करके किया जाता है। स्थान स्वच्छ करें, चंदन या अक्षत से अष्टदल कमल बनाएँ, और मध्य में देवी अपराजिता का तथा दोनों ओर जया और विजया का आह्वान करें। रोली, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें, "ॐ अपराजितायै नमः" का जप करें, और अपने धर्मसम्मत कार्यों में रक्षा और सफलता की प्रार्थना करें।

अपराजिता का अर्थ है "जो कभी पराजित न हो"। पूजन के बाद सीमोल्लंघन की परंपरा है — घर या गाँव की सीमा से थोड़ा आगे जाकर लौटना — जो साहस के साथ नए समय में आगे बढ़ने का प्रतीक है। कई परिवार पूजन के बाद अपराजिता के पुष्प या पत्ते अपने घर के मंदिर में रखते हैं। सरल और सच्चे मन की पूजा पर्याप्त है; कुछ भी भव्य करना आवश्यक नहीं।

घर पर शस्त्र पूजा और वाहन पूजा कैसे करें?

शस्त्र पूजा के लिए अपने औज़ार, यंत्र या शस्त्र स्वच्छ करें — आज अधिकांश परिवारों के लिए इसका अर्थ है अपने काम के औज़ार, बही-खाते, कलम, लैपटॉप या वाहन — और उन्हें स्वच्छ लाल वस्त्र पर रखें। रोली और हल्दी का तिलक लगाएँ, अक्षत, पुष्प और कलावा अर्पित करें, धूप-दीप दिखाएँ, और प्रार्थना करें कि आपका कार्य ईमानदार, सुरक्षित और सफल रहे। विद्यार्थी इसी प्रकार अपनी पुस्तकें और कलम रख सकते हैं।

वाहन पूजा के लिए वाहन धोएँ, उस पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ, कलावा बाँधें, पुष्प और थोड़ी मिठाई अर्पित करें, और उसके सामने दीप जलाएँ। कुछ परिवार अपनी रीति अनुसार नारियल फोड़ते हैं या पहिये के नीचे नींबू रखते हैं; अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करें। शस्त्र पूजा का भाव कृतज्ञता है — उन साधनों का धन्यवाद जो हमारी आजीविका चलाते हैं, और उन्हें धर्म के साथ प्रयोग करने का संकल्प।

दशहरे पर शमी पूजन का क्या महत्व है?

विजयादशमी पर शमी वृक्ष की पूजा इसलिए होती है क्योंकि परंपरा अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास में अपने शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे और इसी दिन उन्हें वापस लिया था, और श्रीराम ने भी लंका-यात्रा से पहले शमी का पूजन किया था। शमी पूजन विजय, बाधाओं के निवारण और घर में शांति की प्रार्थना है।

संध्या को शमी वृक्ष पर जल, रोली, अक्षत, पुष्प और दीप अर्पित करें, श्रद्धा से उसकी परिक्रमा करें और परिवार के लिए प्रार्थना करें। कई लोग "शमी शमयते पापं शमी शत्रुविनाशिनी। अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥" श्लोक का पाठ करते हैं और कुछ शमी पत्ते आशीर्वाद के रूप में घर लाते हैं, या संबंधियों को "सोना" के रूप में देते हैं। यदि पास में शमी वृक्ष न हो, तो शमी की टहनी का पूजन करें या घर के मंदिर में ही प्रार्थना करें — भाव ही सबसे महत्वपूर्ण है।

क्या विजयादशमी नए काम के लिए अबूझ मुहूर्त है?

हाँ। विजयादशमी "साढ़े तीन मुहूर्त" में गिनी जाती है — वर्ष के वे साढ़े तीन स्वयंसिद्ध शुभ दिन, जिनमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अक्षय तृतीया और कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का आधा भाग भी आते हैं। इसलिए व्यापार आरंभ, बच्चों का विद्यारंभ, वाहन या संपत्ति की ख़रीद, या किसी भी धर्मसम्मत कार्य की शुरुआत के लिए यह दिन अलग मुहूर्त के बिना भी व्यापक रूप से चुना जाता है।

एक बात का ध्यान रखें। अधिकांश उत्तर भारतीय परंपराओं में चातुर्मास के दौरान विवाह मुहूर्त नहीं लिए जाते, और दशहरा देवउठनी एकादशी से पहले पड़ता है, इसलिए विवाह प्रायः उसके बाद ही होते हैं। किसी बहुत महत्वपूर्ण कदम — बड़ा निवेश, नई कंपनी या गृह प्रवेश — के लिए फिर भी अपनी कुंडली और उस दिन का पंचांग दिखवा लेना बुद्धिमानी है, ताकि समय आपके लिए व्यक्तिगत रूप से अनुकूल रहे।

दशहरा और गंगा दशहरा में क्या अंतर है?

ये दो अलग पर्व हैं। दशहरा या विजयादशमी आश्विन शुक्ल दशमी को, शारदीय नवरात्रि के बाद आता है और श्रीराम व माँ दुर्गा की विजय का उत्सव है। गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को, लगभग मई-जून में आता है और माँ गंगा के धरती पर अवतरण का उत्सव है — यह हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा स्नान और गंगा पूजन के सबसे बड़े दिनों में से एक है।

दोनों को "दशहरा" कहने के कारण लोग खोजते या यात्रा की योजना बनाते समय अक्सर इन्हें मिला देते हैं। यदि आप हरिद्वार में माँ गंगा के तट पर गंगा स्नान या पूजा की योजना बना रहे हैं, तो गंगा दशहरा उन्हीं को समर्पित पर्व है; विजयादशमी पर ध्यान अपराजिता, शमी और शस्त्र पूजा तथा रावण दहन पर रहता है, यद्यपि किसी भी शुभ दिन गंगा स्नान सदा मंगलकारी है।

दशहरे पर किन बातों का ध्यान रखें?

नवरात्रि का समापन आदर से करें: अपनी पारिवारिक परंपरा अनुसार कलश व जवारों का विसर्जन करें और प्रसाद बाँटें। दिन का आरंभ स्नान और प्रार्थना से करें, बड़ों के चरण स्पर्श करें और मिठाई बाँटें। पूजा सरल और स्वच्छ रखें, और यदि बच्चों को रावण दहन दिखाने ले जाएँ, तो आग और भीड़ से सुरक्षित दूरी रखें। दूसरों के प्रति दया ही इस पर्व का सच्चा उत्सव है।

इंटरनेट पर घूम रहे उन डर दिखाने वाले "दशहरा टोटकों" से सावधान रहें जो निश्चित धन या पक्के इलाज का वादा करते हैं। कोई भी सच्चा शास्त्र भय नहीं सिखाता, और कोई भी उपाय आपकी मन की शांति की क़ीमत पर नहीं होना चाहिए। यदि विवाह, करियर या परिवार में कोई वास्तविक कठिनाई परेशान कर रही हो, तो इधर-उधर के उपाय आज़माने से अच्छा है कि किसी अनुभवी पंडित से शांति से अपनी जन्मपत्री दिखवाएँ।

विजयादशमी पर गुरुजी कैसे सहायता कर सकते हैं?

अपने शहर का विजय मुहूर्त जानने, यह देखने के लिए कि व्यापार आरंभ, वाहन या संपत्ति की ख़रीद के लिए दशहरा आपकी कुंडली के अनुकूल है या नहीं, या हरिद्वार में आपके नाम एवं गोत्र के संकल्प से आपकी ओर से नवरात्रि हवन अथवा दुर्गा सप्तशती पाठ कराने के लिए गुरुजी को व्हाट्सएप करें। पंडित गिरीश चंद्र परगाँई 30+ वर्षों से परिवारों का मार्गदर्शन कर रहे हैं; सलाह ईमानदार एवं सरल है, और किसी भी पूजा का शुल्क बुकिंग से पहले स्पष्ट बताया जाता है।

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